धीरे धीरे से भाग --- 9
दीप्ती के पुरे पैर पर पस बढ़ता ही जा रहा था,, डॉ ने छोटा सा ऑपरेशन कर के पस निकल दिया था दो महीने मे दीप्ती कर पैर बिलकुल थी हो गया और वो पहले की तरफ अपने पैरों पर चलने लगी,,,,,,
दीप्ती की मम्मी बहुत डरती थी कही उसका पैर ख़राब ना हो जाए उसे ज़िन्दगी भर लंगड़ा कर ना चलना पड़े वो रोज़ प्रार्थना करती की वो जल्द से जल्द ठीक हो जाए ,,,,,,
उस समय उसकी कंडीशन ऐसी ही थी की अगर वो खुद कर ध्यान नहीं रखती या दर्द के चक्कर मे पैरों को ज्यादा हिलाया जुलाती नहीं होता तो उसकी नसे जाम हो जाती और न ही कभी भी अपने पैरों पर खड़ी हो पाती ,,,,,,
दीप्ती को डॉ. ने कई बार कहा था की ठीक से चलो नहीं तो आगे जा कर बहुत परेशानी हो जाएगी,,,,
दीप्ती बोलती अंकल बहुत दर्द होता है सीधा भी नहीं किया जाता पैर और ना ही चला जाता है,,,,,
वो बोलते अगर ऐसे ही करोगी तो अपने पैरों से हाथ धो बैठीगी ज़िन्दगी पर के लिए,,,,,, और इतनी बड़ी हो 12+हो दर्द से डरती हो,,,,,
दीप्ती बोली 12+ हूँ तो क्या वहाँ थोड़ी दर्द से लड़ना सिखाया जाता था दीप्ती का मुँह बन गया था और डॉ. हँसने लग गयें,,,,,
दीप्ती को खुद भी यकीन नहीं था की वो ठीक हो जाउंगी उसकी हालत ही ऐसी थी उस ने खुद को तैयार कर लिया था की वो अब कभी चल नहीं पायेगी पर कहते है ना जाको रखे सईया मार सके ना कोई,,,, वो तो मम्मी की प्रार्थना का ही असर था की वो आज अपने पैरों पर खड़ी थी !
इन सब की वजह से दीप्ती के पेपर भी रह गयें थे पढ़ाई बीच मे ही छोड़नी पड़ी थी उसे ,,,,, पर ठीक होते ही उसने फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी,,,,,
इस बीच उस के मन ने फिर से अपना पुराना दबा हुआ एहसास ने पनपना शुरू कर दिया था वही अनजाना से डर ने उसे घेर लिया था उसकी अच्छी बाते याद करती और सोचती इतना अच्छा तो है फिर मुझे क्यों ये डर सताने चला आता है उसका दिल उसके लिए गवाही क्यों नहीं देता उसे इतना समझने वाला फ़िक्र करने वाला शायद ही कोई और मिले दिन तो गुजर जाता था राते आँखो मे ही काट जाती थी पहले जैसी अब वो बात नहीं थी अपनी ही दुनिया जो उसने अपने आस पास बना रखी थी चाह कर भी उससे निकल नहीं पा रही थी वो ,,,,,
खाना भी अच्छा नहीं लगता था फिर उसके मन मे आया अब के वीर आएगा तो उससे बोल दूंगी की मुझे उससे शादी नहीं करनी है मुझे वो पसंद ही नहीं है,,,,,,,
कुछ दिनों बाद ज़ब वीर दीप्ती के घर पर आए तो मुझसे बात कर ने के लिए परेशान हो रहे था पर दीप्ती ने एक भी मौका नहीं दिया उसे बात करने कर हर समय काम मे लगी रही,,,,,,,
रात को खाना खा कर ज़ब दीप्ती बाहर आई तो उसने पता नहीं कैसे उसे देख लिया बाहर आते हुए वो भी भागे भागे बाहर आया और बोला, क्या यार ज़ब से आया हूँ तुम से बात करने के लिए तरस रहा हूँ तुम सामने ही नहीं आई मेरे,,,
वीर मुस्कुराता हुआ बोल,,,,क्या हुआ है मुझसे ही इतनी लुक्का चुप्पी क्यों खेल रही हो,,,,,
दीप्ती चिढ़ते हुए बोली मै क्या मलतब है तुम्हारा तुम से क्या मै डरती हूँ जो छुपऊंगी खुद को क्या समझते हो कही की तोप हो जो मुझे सामने देखते ही मुझ पर फट जाओगे,,,,,,
अरे बाबा रे आखिर मैंने ऐसा कहा क्या है जो तुम मुझ पर भड़क रही हो,,,,,,,
दीप्ती की भोए तन गयी और बोली मै भड़क रही हूँ तुम्हारा मतलब क्या है की मै लड़ाका हूँ मेरे सर पर सिंह लगे है जो तुम्हे देखते ही लगी मरने,,,,
वो धीरे से बोला लग तो ऐसा ही रहा है और अपना मुँह घुमा दिया,,,,,,,
दीप्ती ने जैसे ही उसकी तरफ अपनी उंगली दिखाई तो वो बोला,,,,
आज क्या मिर्ची खा कर आई हो जो हर बात पर तीखा ही बोल रही हो,,,,,
ये बोलते हुए उसने दीप्ती के कंधो से पकड़ लिया,,,,,
फिर क्या था दीप्ती को गुस्सा आ गया उसने एक पल भी नहीं लगाया मार दिया उसके गला पर एक चमाट,,,,,
उसने दीप्ती की ये हरकत देख कर आश्चर्य से दीप्ती को देखा और उसे बाजु से पकड़ कर अपनी और खींच लिया,,,,,
दीप्ती उस के बहुत करीब थी उसकी साँसे वीर की साँसो से टकरा रही थी दीप्ती के मन मे एक पल के लिए तूफान मच गया वो वीर दीप्ती की आँखो मे आँखे डाल कर बोला,,,,,
तुम्हारा मूड बहुत ख़राब है तो मुझे नहीं लगता की इस समय तुमसे से कोई भी बात की जाए ये बोल कर उसने मुझे छोड़ दिया और अपने कमरे मे चला गया,,,,,
उसकी साँसे अभी भी थम नहीं रही थी दिमाग़ एक दम शून्य हो गया था वो धम से वही बैठ गयी और उसकी नज़रो के सामने से अभी कुछ देर पहले कर नज़ारा जा ही नहीं रहा था अभी भी वो सिहर रही थी हाथ पैर ठन्डे पड़ गयें थे उसके कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई थी उसका हाथ भी पकड़ने की और ये ये यों तो उसकी आँखो से आँसू गिरने लगे थे,,,,,,,
सुबह कर समय
नाश्ते के समय दीप्ती का सामना वीर से हो गया वो उसे इग्नोर करते हुए अपना नाश्ता खत्म किया और कॉलेज के लिए निकल गयी बस स्टॉप पर खड़ी हो कर बस कर इंतजार कर रही थी बस अभी आई नहीं थी पर वीर आ गया था वो बिलकुल उसके सामने अपनी बाइक के साथ खड़ा था,,,,,
उसने दीप्ती से बोला गाड़ी मे बैठो मुझे बात करनी है तुमसे,,
दीप्ती ने अपने दोनों हाथो को फोल्ड किया और बोली मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ कही भी,,,,
उसने उसे गोद मे उठा कर गाड़ी पर बिठा दिया और जल्दी से खुद भी बैठ गया और बाइक स्टाट कर दी,,,,,
दीप्ती तेज़ तेज़ उसकी पीठ पर मरने लगी और बोली ये क्या बत्तमीज़ी है गाड़ी रोको मुझे कँहा ले जा रहे हो,,,,,
वो कुछ नहीं बोला बस सीधा गाड़ी चलता रहा,,,,,
जारी है
RISHITA
02-Sep-2023 10:01 AM
Amazing
Reply
madhura
01-Sep-2023 10:56 AM
Nice
Reply
Anjali korde
29-Aug-2023 11:42 AM
Nicec
Reply